मेरी ज़िंदगी एक ऐसी घुटन है
जिसका कोई नाम नहीं,
पर हर पल मौजूद है।
मैं लोगों के बीच रहता हूँ,
फिर भी भीतर से अकेला हूँ।
मेरी आवाज़ मेरे ही अंदर दब कर रह जाती है।
मैं रोज़ उठता हूँ,
पर किसी उम्मीद के साथ नहीं —
बस इसलिए क्योंकि उठना ज़रूरी है।
दिन गुजरते जाते हैं,
और मैं उनके साथ बस खिंचता चला जाता हूँ।
मेरी ज़िंदगी अब जीना नहीं,
निभाना बन चुकी है।
मैं मुस्कुराता हूँ,
क्योंकि लोगों को लगता है
मुस्कुराता इंसान दुखी नहीं हो सकता।
मैं चुप रहता हूँ,
क्योंकि मेरी बातें सुनने का
किसी के पास समय नहीं है।
धीरे-धीरे यह चुप्पी
मेरी आदत नहीं,
मेरी पहचान बन गई है।
मेरे भीतर बहुत कुछ दबा हुआ है —
वे सपने जो कभी कहे नहीं गए,
वे दर्द जो कभी समझे नहीं गए,
और वे सवाल
जो हर रात मुझे सोने नहीं देते।
कभी-कभी लगता है
मैं अपनी ज़िंदगी नहीं जी रहा,
बस दूसरों की उम्मीदें पूरी कर रहा हूँ।
जैसे मेरी ज़िंदगी मेरी नहीं रही,
बस एक बोझ बन गई है
जिसे रोज़ ढोना पड़ता है।
मैं थक चुका हूँ,
पर यह कहने का हक़ नहीं है
कि मैं थक गया हूँ।
मैं टूट चुका हूँ,
पर मज़बूत दिखना मेरी मजबूरी है।
सबसे तकलीफ़देह बात यह है
कि मेरी घुटन किसी को दिखाई नहीं देती।
इसलिए सब मान लेते हैं
कि मैं ठीक हूँ।
सच यह है
कि मैं चल तो रहा हूँ,
पर जी नहीं रहा हूँ।
और इस घुटन की
एक वजह यह भी है
कि मैंने किसी को
पूरे दिल से चाहा था।
पर अधूरा रह गया
क्युकी ये समाज किसी के
प्यार को नहीं समझ सकता
उसके अंदर की दर्द तकलीफ़ को नहीं समझ सकता
बस समाज से हार गए हम
और अपने अंदर एक ख्वाहिश दबा लिए
लोग ये क्यों नहीं समझते
उस इंसान पे क्या गुजरता है
अंदर ही अंदर टुटता रहता है चीखता रहता है
सोचता रहता है अपनी क़िस्मत को कोसता रहता
सायद हम ना मिले होते सायद हमारे दिल में एक दूसरे के लिए कोई प्यार नहीं होता
ऐसा क्यों होता है जब क़िस्मत में कोई नहीं होता वो ज़िंदगी में इतना क़रीब क्यों आता है
बहुत से सवाल करता है ख़ुद
और हर सवाल क्यों पे ही आ कर ख़त्म होता है
आख़िर क्यों ऐसा है
हम दोनों चाहते थे,
हम हार गए,
पर यह स्वीकार करना पड़ा
कि कभी-कभी
सच्चा प्यार भी
बाहरी दुनिया के नियमों के सामने
असहाय हो जाता है।
अब मेरी घुटन
सिर्फ़ अकेलेपन की नहीं है,
बल्कि उस रिश्ते की है
जो ज़िंदा था
पर समाज की सोच में
पूरा नहीं हो सका।
मैंने इसे स्वीकार कर लिया है।
हमारा प्यार खत्म नहीं हुआ —
बस एक नए रूप में
मेरे अंदर सुरक्षित है।
मैं आज भी
लोगों के बीच रहता हूँ,
हँसता हूँ,
ज़िम्मेदारियाँ निभाता हूँ।
पर भीतर कहीं घुटता रहता हूँ
एक बेसहारा की तरह ये सोच कर
की जीना तो है चाहे अंदर से मार क्यों नहीं गए है
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